शनिवार, 14 जून 2008
सहकारिता एवम राजनीति
सहकारिता का जन्म जिन उद्देश्यों के लिए किया गया था,उसमे निश्चित रूप से भारतीय परिवेश मे उक्त आन्दोलन की सार्थकता रही है अपने प्रारम्भ से आज तक प्रगति की सोपान तय करके आज फिर से आत्म मूल्यांकन की स्थिति मे है ,सहकारिता का उदभव विकास स्वतंत्रता पूर्व से ही शुरू होकर अपने उद्देश्यों को साकार करने मे सफल रही है किंतु समय के साथ साथ सहकारिता के क्षेत्र मे राजनीति के प्रवेश के साथ एक अमूल्य सिध्दांत भी दागदार बन के रह गया है,भारत के कुछ प्रदेशो मे जंहा इसने अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराई है वही कुछ प्रदेशो मे सिर्फ़ सरकारी नियंत्रण मे कसमसाती रह गयी,इसका कारण क्या है? क्यो यह सरकारी नियंत्रण से उबर नही पाई,क्यो अधिकांश सहकारी संस्थाये घाटे मे चल रही ?क्या कारण है की इन संस्थाओ मे घोटाले होते रहे?इन सब बातो पर फिर से विचार करने का समय आ गया है। इन संस्थाओ के बरे मे आपके विचारो का स्वागत है ........
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